
पञचयज्ञ-महिमा
[आकार-२०x३०, पृष्ठ-१६, मूल्य- १० रूपये]
वैदिक धर्म ग्रन्थों में प्रत्येक ग्रहस्थ नर-नारी के लिए प्रतिदिन पञचयज्ञ करने अनिवार्य बताए गए हैं। क्योंकि पञचयज्ञों को श्रद्धापूर्वक करने से ही ग्रहस्थ-जीवन के सब सुख प्राप्त होते हैं। प्रतिदिन पञचयज्ञ करने वाले डॉ० वेदप्रकाश ने ‘पञचयज्ञ-महिमा’ में पञचयज्ञों अर्थात् १. ब्रहमयज्ञ [सन्ध्या], २. देवयज्ञ [अग्निहोत्र या हवन], ३. बलिवैश्व-देवयज्ञ [अन्न का दान], ४. पितृयज्ञ [माता-पिता, गुरू आदि पितरों की सेवा और उनका सम्मान] तथा ५. अतिथियज्ञ की महिमा का वर्णन दोहा और चैपाई-छन्दों में बहुत सरल और सुन्दर भाषा में किया है। ‘पञचयज्ञ-महिमा’ को प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक पढ़ने और सुननेवाले मनुष्य प्रतिदिन पञचयज्ञ करने लगता है, जिनके फलस्वरूप उनके घर-परिवार में दुःख, दोष, दुर्गुण और दुष्कर्म समाप्त हो जाते हैं तथा उन्हें सब सुख प्राप्त होते हैं।